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*मकर संक्रांति*

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*बुन्देलखण्ड में मकर संक्रांति* मकर संक्रांति को बुन्देलखण्ड में *बुड़की* कहा जाता है।   हमारे बुंदेलखंड में मकर संक्रांति पर्व बहुत हर्ष उल्लास से मनाया जाता है, इस दिन भारी ठंड होने के बाद भी सुबह से नदी तालाब या कुवां में स्नान करने के लिए बच्चों, बूढ़ों और जवानों मे उत्साह देखते ही बनता है । कई दिन पहले से घरों में विविध प्रकार के पकवान, यथा गुजिया, खुरमा, पपरिया, तिल,बेसन, लाई, सूजी, कठिया गेहूं आदि के लड्डू बनाए जाते, सुबह से पूड़ी, ठडूला, और खिचड़ी अनिवार्य है फिर मेला और मेला से बराई (गन्ना) लेना कोई नहीं भूलता है हां एक विशिष्ट परम्परा है कि उस दिन हमारी बुआ, बहिनें और बेटियां सभी  *गड़िया घुल्ला*  (शक्कर से बनी एक प्रकार की मिठाई)जरूर लाती हैं। इस दिन कुम्हार/प्रजापति (मिट्टी के बर्तन बनाने वाले) मिट्टी के घोड़ा और बड़े दीपक भी लाते हैं। हम इन सभी कार्यों को प्रथा के रुप में बचपन से देखते आ रहे हैं , कई बार इस पर्व का अर्थ समझने की कोशिश की कई लोगों से जानना चाहा, किन्तु जवाब नहीं मिला। फिछले वर्ष अपने विद्यालय में बैठा था कि उसी समय वहां से एक आदरणी...

आधुनिक समय में प्राथमिक/माध्यमिक विद्यालयों की पुकार

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 नमस्कार साथियों🙏 आज 5 सितंबर शिक्षक दिवस की सभी शिक्षक साथियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं आज का दिन हमारे शिक्षकों का धन्यवाद करने का दिन है, हो सके तो अपने शिक्षकों को आज के दिन एक प्यारा सा संदेश जरूर भेजें भेजिएगाl साथियों शिक्षक की जिम्मेदारी न केवल विद्यालय में आने वाले छात्रों को अक्षर ज्ञान करना है बल्कि समाज को दिशा देना भी शिक्षक का कर्तव्य होता है निश्चित रूप से हम सभी शिक्षक साथी अपने संपूर्ण प्रयास के साथ इस कार्य में लगे हैं फिर भी वर्तमान में  शिक्षा की गुणवत्ता में खासकर सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय में शिक्षा की गुणवत्ता का गिरता स्तर  चिंता का विषय है, इन विद्यालयों के अस्तित्व पर संकट की  स्थिति बन रही है, इसी पर मैं आज अपने विचार आपके साथ साझा कर रहा हूं🙏 आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं 🙏   विद्यालयों में गिरते हुए शिक्षा  स्तर के अनेक कारण हैं इनमें से आज के लेख में कुछ  पर प्रकाश डालना चाहता हूं, सर्वप्रथम सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के अनुपात में तो शिक्षक उपलब्ध हैं किंतु कक्षा या विषय की मांग से...

कोशिश

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कोशिश करने वालों की  भी हार होती है! एक दो बार नहीं, कई कई बार होती है है।। युद्ध लड़े जब दो राजा, तब निश्चित एक ही हार होती है, टकराए जब दो अस्त्र ,तो एक की शक्ति बेकार होती है।   दी परीक्षा लाखों ने ,पर  सैकड़ो की ही साकार होती है, फिर जरा सोचिए हजारों हजारों की हार होती है।। फिर कौन कहता है  कि, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है?  फिर कौन कहता है की कोशिश करने वालों की हार नहीं होती है?  एक बार नहीं ,दो बार नहीं कहीं कई बार होती है , कोशिश करने वालों की ही हार होती है ........2 मगर  मेहनत तो फिर मेहनत है ,वह कहां बेकार होती है। वह कभी-कभी साकार, तो कभी तजुर्बेदार होती है।।